आदिवासी दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, आत्ममंथन और अधिकारों की लड़ाई को मजबूत करने का दिन है : डॉ. देवशरण भगत
RANCHI: विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आजसू पार्टी के केंद्रीय मुख्य प्रवक्ता एवं झारखंड आंदोलनकारी डॉ. देवशरण भगत ने आदिवासी समाज को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि एक झारखंड आंदोलनकारी और आदिवासी समाज के नेतृत्वकर्ता के रूप में आज का दिन मेरे लिए केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्ममंथन, चिंता और संकल्प का दिन है।
जिस झारखंड के निर्माण के लिए आंदोलनकारियों ने संघर्ष और बलिदान दिया, उस झारखंड में आज भी आदिवासी समाज अपने मूल अधिकारों, पहचान और भविष्य को लेकर सवालों के बीच खड़ा है।
डॉ. भगत ने कहा कि झारखंड केवल एक भौगोलिक राज्य नहीं, बल्कि आदिवासी संघर्ष, संस्कृति, अस्मिता और बलिदान की ऐतिहासिक भूमि है। बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो और हजारों आंदोलनकारियों के संघर्ष की बुनियाद पर झारखंड राज्य का निर्माण हुआ।
लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य बनने के बाद आदिवासी समाज को उसके संघर्ष का वास्तविक प्रतिफल कितना मिला?
उन्होंने कहा कि आज आदिवासी समाज के सामने जल, जंगल, जमीन, विस्थापन, पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, भाषा-संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा जैसी गंभीर चुनौतियां हैं। आदिवासी दिवस पर मंचों से अधिकारों की बात करना आसान है, लेकिन उन अधिकारों को जमीन पर लागू करना सरकार की वास्तविक परीक्षा है।
डॉ. भगत ने कहा कि यह कैसी विडंबना है कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध झारखंड के आदिवासी युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर हैं।
गांवों से युवाओं का लगातार पलायन केवल आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की सामाजिक संरचना, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
उन्होंने कहा कि झारखंड पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है। CNT, SPT और PESA जैसे प्रावधान आदिवासी समाज के अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं।
इन कानूनों का अस्तित्व तभी सार्थक है, जब ग्रामसभा, समुदाय और आदिवासी समाज को वास्तविक अधिकार और निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी मिले।
कानून किताबों में सुरक्षित रहें और जमीन पर अधिकार कमजोर होते रहें, यह स्थिति स्वीकार्य नहीं हो सकती।
डॉ. भगत ने कहा कि आदिवासी समाज को केवल वोट बैंक या सरकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप में देखने की राजनीतिक सोच बदलनी होगी।
आदिवासी समाज इस राज्य का निर्माता है और उसे अपने भविष्य का निर्णायक भागीदार बनने का अधिकार है। विकास के नाम पर यदि स्थानीय समुदाय की भागीदारी, सहमति और अधिकारों की उपेक्षा होती है तो उस विकास की अवधारणा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
उन्होंने कहा कि आज देश में आदिवासी समाज के कई संवैधानिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बावजूद जमीन पर आदिवासी समाज की अपेक्षाएं और आकांक्षाएं अभी पूरी नहीं हुई हैं।
सत्ता में प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रतिनिधित्व तभी सार्थक होगा जब उससे गांव के अंतिम आदिवासी परिवार के जीवन में बदलाव दिखाई दे।
डॉ. भगत ने सरकार से मांग की कि विश्व आदिवासी दिवस को केवल सरकारी कार्यक्रमों और औपचारिक घोषणाओं तक सीमित न रखा जाए।
सरकार आदिवासी जमीन की सुरक्षा, स्थानीय रोजगार, पलायन रोकने, शिक्षा-स्वास्थ्य, ग्रामसभा के अधिकार और संवैधानिक प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन पर स्पष्ट और समयबद्ध कार्ययोजना सार्वजनिक करे।
उन्होंने कहा कि झारखंड आंदोलन का सपना केवल अलग राज्य का निर्माण नहीं था। सपना था—ऐसा झारखंड जहां जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समाज का अधिकार हो; जहां युवाओं को रोजगार मिले; जहां आदिवासी-मूलवासी अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।
डॉ. भगत ने कहा कि एक झारखंड आंदोलनकारी के रूप में और आदिवासी समाज के एक कार्यकर्ता के रूप में मैं यह मानता हूं कि झारखंड आंदोलन अभी समाप्त नहीं हुआ है।
राज्य का निर्माण आंदोलन की पहली मंजिल थी, लेकिन सामाजिक न्याय, अधिकार, सम्मान और समतामूलक विकास की लड़ाई अभी जारी है।
उन्होंने कहा कि आजसू पार्टी झारखंड आंदोलन की मूल भावना के अनुरूप जल, जंगल, जमीन, पहचान, सम्मान, रोजगार और सामाजिक न्याय के सवालों पर संघर्ष करती रहेगी।
विश्व आदिवासी दिवस पर हमारा संकल्प होना चाहिए कि आदिवासी समाज को केवल शुभकामनाएं नहीं, बल्कि उसके अधिकार, उसकी आवाज और उसके भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
