September 27, 2026

फोटो खिंचवाते समय बच्चे की आंख में दिखे सफेद चमक तो न करें नजरअंदाज: डाॅ संतोष जी. होनावर

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आंख में केमिकल पड़ा तो पहले पानी डालें, रगड़े नहीं : डॉ हरवंश लाल

लंबे समय तक मोबाइल, टैबलेट या किताब को अत्यधिक निकट रखकर पढ़ने और आउटडोर गतिविधियों की कमी से बच्चों में मायोपिया तेजी से बढ़ रहा: डाॅ मोहन राजन 

RANCHI:  होटल चाणक्य बीएनआर में शनिवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश के प्रमुख नेत्र रोग विशेषज्ञों ने आंखों की बीमारियों के लक्षण, बचाव और आधुनिक उपचार की जानकारी साझा करते हुए लोगों से साल में कम से कम एक बार आंखों की जांच कराने की अपील की।

आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. बीपी कश्यप और सचिव डॉ. भारती कश्यप ने सम्मेलन के उद्देश्य की जानकारी दी।

ऑल इंडिया ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी की वाइस प्रेसिडेंट डॉ. चित्रा रामामूर्ति ने कहा कि आंखों में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।

मोतियाबिंद में धुंधला दिखाई देने के अलावा रात में रोशनी से चकाचौंध, तेज रोशनी में परेशानी और रंगों के बीच अंतर कम समझ आना भी प्रमुख संकेत हैं।

उम्र बढ़ना, डायबिटीज और आंख में चोट इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि मोतियाबिंद का पता चलते ही हर मरीज को तुरंत सर्जरी की जरूरत नहीं होती।

जब दृष्टि पढ़ने, काम करने, ड्राइविंग या रोजमर्रा की गतिविधियों में बाधा डालने लगे, तब सर्जरी पर विचार किया जाता है।

फेको और फेम्टोसेकंड लेजर जैसी आधुनिक तकनीकों में सर्जन की भूमिका निर्णायक रहती है। जरूरत के अनुसार विभिन्न प्रकार के IOL लेंस लगाए जा सकते हैं।

वहीं डॉ. संतोष जी. होनावर ने बच्चों की आंख में दिखने वाली White Reflex को गंभीरता से लेने की सलाह दी।

यह रेटिनोब्लास्टोमा यानी बच्चों के आंख के कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है।

समय पर पहचान होने पर आधुनिक उपचार से जान, आंख और उपयोगी दृष्टि बचाने की बेहतर संभावनाएं रहती हैं।

कीमोथेरेपी, लेजर, क्रायोथेरेपी और अन्य उपचार विकल्पों से अब हर मामले में आंख निकालना जरूरी नहीं होता।

प्रो. (डॉ.) नम्रता शर्मा (चेयरपर्सन , नेशनल आई बैंक, आरपी सेंटर, एम्स नई दिल्ली एवं अध्यक्षा, वैज्ञानिक समिति, AIOS):
डॉ. नम्रता शर्मा ने कहा, “देश में हर साल करीब 1 लाख कॉर्निया ट्रांसप्लांट की जरूरत है, जिसके लिए लगभग 2 लाख नेत्रदान आवश्यक हैं।

इसके मुकाबले 2023-24 में देश में 66,395 नेत्रदान हुए, जबकि लक्ष्य 75 हजार था। 2024-25 में नेत्रदान का लक्ष्य बढ़ाकर 80 हजार किया गया।

यह अंतर बताता है कि नेत्रदान के प्रति जागरूकता और बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही, कॉर्निया की बीमारी या आंख की गंभीर चोट में समय पर इलाज रोशनी बचा सकता है।

आंख में केमिकल पड़ा तो पहले पानी डालें, रगड़े नहीं : डॉ हरवंश लाल


चोट छोटी लगे तब भी लापरवाही न करें, समय पर इलाज से बच सकती है रोशनी
आंख में केमिकल, कंकड़ या धूल चली जाए तो आंख न मलें। दिल्ली के वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. हरवंश लाल के अनुसार, केमिकल इंजरी में हर मिनट महत्वपूर्ण है।

तुरंत पर्याप्त मात्रा में साफ बहते पानी से आंख को अच्छी तरह धोएं और इसके बाद नेत्र विशेषज्ञ से जांच कराएं।

किसी खास आई ड्रॉप या पानी की तलाश में समय न गंवाएं।
आंख में कंकड़ या धातु का टुकड़ा चला जाए तो रगड़ने से वह कॉर्निया में और अंदर जा सकता है।

पानी से आसानी से न निकले तो खुद निकालने की कोशिश न करें।

डॉ. मोहन राजन (प्रेसिडेंट-इलेक्ट, AIOS एवं वरिष्ठ कैटरेक्ट, ग्लूकोमा व रिफ्रैक्टिव सर्जन):

डॉ. मोहन ने बताया की “मायोपिया को केवल चश्मे का सामान्य नंबर न समझें। इसे समय पर पहचानें, नियमित जांच कराएं और दृष्टि को सुरक्षित रखने के लिए विशेषज्ञ की सलाह लें।”

लंबे समय तक मोबाइल, टैबलेट या किताब को अत्यधिक निकट रखकर पढ़ने और आउटडोर गतिविधियों की कमी से बच्चों में मायोपिया तेजी से बढ़ रहा है।

यदि बच्चा टीवी के बहुत पास बैठता है, किताब/स्क्रीन को आंखों के करीब रखता है, आंखें सिकोड़कर देखता है, बार-बार सिरदर्द या आंखों में थकान बताता है अथवा स्कूल बोर्ड साफ नहीं देख पाता, तो तत्काल जांच कराएं।

बढ़ता हुआ मायोपिया आंख की पुतली की लंबाई बढ़ा देता है, जिससे भविष्य में रेटिनल डिटैचमेंट, ग्लूकोमा, समय से पहले मोतियाबिंद तथा मायोपिक मैक्युलर डिजेनेरेशन जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

इसके रोकथाम के लिए बच्चों को प्रतिदिन कम से कम 1 से 2 घंटे धूप और खुले मैदान में खेलने के लिए प्रेरित करें।

हर 20 मिनट के नजदीकी कार्य/स्क्रीन वर्क के बाद 20 सेकंड के लिए कम से कम 20 फीट दूर देखें।

आवश्यकता पड़ने पर नेत्र रोग विशेषज्ञ से परामर्श कर मायोपिया-कंट्रोल ग्लासेस, लो-डोज एट्रोपिन ड्रॉप्स अथवा ऑर्थो-के (Ortho-K) जैसे आधुनिक विकल्पों को अपनाएं।

उन्होंने कहा कि ग्लूकोमा से घबराने की नहीं, बल्कि सतर्क रहने की जरूरत है।

भारत में 40 वर्ष से अधिक उम्र के करीब 1.12 करोड़ लोग इससे प्रभावित हैं और यह अपरिवर्तनीय दृष्टिहीनता (Irreversible Blindness) का बड़ा कारण है। शुरुआत में बिना किसी लक्षण या दर्द के यह ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचाता है।”

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