आईएसएसएस ने डॉ सरकार को मानद सदस्यता देने की घोषणा की

सोसाइटी के राहुरी  (महाराष्ट्र) में 86 वीं वार्षिक अधिवेशन में मानद सदस्यता-2022 प्रदान किया जायेगा

RANCHI:  इंडियन सोसाइटी ऑफ़ सायल साइंस (आईएसएसएस), नई दिल्ली ने देश के जाने-माने सायल साइंटिस्ट डॉ एके सरकार को आईएसएसएस मानद सदस्यता-2022 देने की घोषणा की है.

इस आशय की सूचना सोसाइटी के सचिव डॉ केके बंधोपाध्याय ने मंगलवार को दी. डॉ सरकार को महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी (महाराष्ट्र) में 15-18 नवंबर की आयोजित सोसाइटी के 86 वीं वार्षिक अधिवेशन में मानद सदस्यता-2022 प्रदान किया जायेगा.

डॉ सरकार, जो बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के सायल साइंस विभाग के पूर्व चेयरमैन, पूर्व डीन एग्रीकल्चर और प्रभारी कुलपति भी रह चुके है. राज्य के सभी जिलों के जिला एवं ब्लाक लेवल सायल फर्टिलिटी मैप, अम्लीय भूमि प्रबंधन, दीर्घ एवं स्थाई उर्वरक प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन के क्षेत्र में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है.
इस सोसाइटी की स्थापना 1934 में हुई थी. वर्त्तमान में सोसाइटी की पूरे देश में 51 से अधिक चैप्टर कार्यरत है. इससे पहले सोसाइटी की मानद सदस्यता से संयुक्त बिहार में 1984 में स्व. प्रो एससी मंडल तथा झारखण्ड में डॉ बीपी सिंह को नवाजा जा चुँका है.
डॉ सरकार की इस उपलब्धि पर डीन एग्रीकल्चर डॉ एसके पाल, सोसाइटी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ बीपी सिंह, सोसाइटी के रांची चैप्टर के अध्यक्ष डॉ डीके शाही, उपाध्यक्ष डॉ अब्दुल वदूद, सचिव डॉ बीके अग्रवाल के अलावा डॉ पीके सिंह, डॉ एस कर्माकार, डॉ अरबिंद कुमार, डॉ प्रभाकर महापात्रा ने बधाई दी है.

बीएयू कुलपति ने डॉ सरकार को दी बधाई


बीएयू कुलपति डॉ ओंकार नाथ सिंह ने डॉ एके सरकार को आईएसएसएस मानद सदस्यता-2022 के लिए चयन किये जाने पर ख़ुशी जाहिर की और बधाई दी है. लंबे वर्षो तक विवि सेवा में योगदान एवं उपलब्धियों की प्रशंसा की. डॉ सरकार से विवि एवं राज्य हित में समय-समय पर बहुमूल्य सुझाव देने की अपेक्षा जताई है.

बदलते मौसम में रबी फसलों की खेती में सुधारात्मक उपायों की जरूरत : डॉ एके सरकार

विगत दस वर्षों के दौरान झारखंड राज्य में मौसम की स्थिति विशेष रूप से वर्षा का वितरण और देर से बारिश की शुरुआत ने किसानों को देर से यानी खरीफ फसलों के मामले में जून के बजाय जुलाई माह में खेत की तैयारी/फसल लगाने के लिए मजबूर किया है. जिससे रबी फसलों का आच्छादन प्रभावित होती है. जबकि इस वर्ष अबतक असमय वर्षा होने से रबी फसलो की खेती पर प्रतिकूल असर पड़ा है. ऐसी विषम परिस्थिति राज्य के विभिन्न हिस्सों में जलवायु परिवर्तन के कारण बनी है. कृषि वैज्ञानिकों एवं राज्य सरकार को इस स्थिति में रबी फसलों के आच्छादन बढ़ाने की इस दिशा में विशेष गौर करने और उपयुक्त व्यावहारिक समाधान सुझाने एवं रणनीति बनाने की जरूरत है.

उपयुक्त जानकारी जाने-माने कृषि वैज्ञानिक एवं बीएयू के पूर्व डीन एग्रीकल्चर डॉ एके सरकार ने राज्य में बदलते मौसम के परिवेश में सुधारात्मक उपायों पर सुझाव के तहत साझा की.

डॉ सरकार बताते है कि हाल में बीएयू के 42 वीं शोध परिषद् की बैठक में राज्य के वर्षा सिंचित क्षेत्रों में रबी फसलों जैसे गेहूं,जौ,दलहन,तिलहन और सब्जियों की खेती में चुनौती और उनके सुधारात्मक उपायों पर विस्तार से चर्चा हुई.

प्रदेश में सिंचाई की सीमित उपलब्धता (11 से 15 प्रतिशत मात्र) है. खरीफ सीजन में खेती का 70 प्रतिशत क्षेत्र धान फसल के अधीन है, जबकि रबी सीजन में अधिकांश भूमि (विशेषकर ऊपरी और मध्यम भूमि) परती रहती है.

जिसकी मुख्य वजह धान फसल की देर से बुवाई/रोपाई और फसलों (मुख्य रूप से धान) की देर से कटाई है.

ऐसी भूमि में धान एवं अन्य खरीफ फसल की कम अवधि वाली उन्नत किस्मों को बढ़ावा देकर रबी फसलों का आच्छादन बढाया जा सकता है.

रबी सीजन में धान की खेती उपरांत करीब 14 लाख हेक्टेयर परती भूमि को उन्नत फसल प्रौद्योगिकी (विशेषकर कम अवधि एवं सिंचाई वाली दलहनी एवं तेलहनी फसल) से आच्छादित कर समाधान संभव होगा.

बदलते मौसम के परिवेश में खेतों में मल्चिंग तकनीक, जैविक खाद, हरी खाद, फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण, प्राकृतिक खेती, वर्मी कम्पोस्टिंग द्वारा मिट्टी में कार्बनिक कार्बन के प्रयोग को सशक्त बनाने पर विशेष जोर देनी होगी.

डॉ सरकार ने सुझाव दिया कि प्रदेश में फसलों के आच्छादन की सफलता हरी खाद, दलहनी एवं तिलहनी फसलों की उन्नत बीजों की उपलब्धता पर निर्भर करती है. एक बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों की तुलना में फसलों के आच्छादन की प्रणाली अधिक जटिल है. राज्य में कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन और किसानों का उचित प्रशिक्षण/अभियान नितांत आवश्यक है. मिट्टी के कटाव पर नियंत्रण, सिंचाई की व्यवस्था, मिट्टी के नुकसान की जाँच, मिट्टी के कार्बनिक पदार्थों में सुधार आदि पर विशेष ध्यान में रखना होगा.

इसलिए राज्य सरकार के कृषि विभाग, केवीके, आत्मा, क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्रों और किसानों का समर्थन रबी फसलों के आच्छादन को बढ़ाने के प्रयासों की सफलता सुनिश्चित करेगा.

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