आदिवासी कल्याण के लिए प्रतिबद्ध नरेन्द्र मोदी सरकार

 

बाबूलाल मरांडी

लेखक झारखंड भाजपा विधायक दल के नेता सह राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री 

 

RANCHI:  लोकतंत्र का मनोरथ आम लोगों और अंतिम पायदान पर मौजूद तबकों की भलाई होता है।

विडम्बना देखिए, आजाद भारत में विकास के सपने तो तमाम सरकारों ने दिखाए, हमारे देश में लोकतंत्र तो स्थापित हुआ किंतु शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, सामाजिक न्याय, सड़क जैसे सामाजिक सरोकार से जुड़े जनकल्याणकारी मुद्दे सरकार की प्राथमिकताओं में साल 2014 में शामिल किए गए।

विकास का अर्थ हमेशा सकारात्मक बदलाव से होता है और यह बदलाव अब नजर आ रहा है। 26 मई 2014 का दिन देश के भविष्य का ऐतिहासिक दिन बन गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समूचे देश को एक सूत्र में बांधकर “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” के सपने को साकार कर दिया है।

देश में आदिवासी समाज की आबादी कुल आबादी का 9 फीसदी यानि लगभग 11 करोड़ है।

भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक जनजातीय समाज बड़ी तादाद में है, विशेषकर झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, राजस्थान और गुजरात में इनकी बड़ी आबादी है।

दुर्भाग्य है कि आजादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस ने इन्हें सिर्फ वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया।

इतिहास गवाह है कि स्वतंत्रता आंदोलन में भी इस समाज का योगदान और बलिदान अविस्मरणीय है।

किंतु आजादी के बाद की सरकारों द्वारा लंबे समय तक जनजातीय समाज को विकास की मुख्यधारा से जोडने तथा इनके सामाजिक और आर्थिक उत्थान सहित राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए।

आदिकाल से ही आदिवासी समाज को एक पिछड़ा समाज मानकर उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता रहा है।

जनजाति समाज का भारत की संस्कृति को मजबूत बनाने में अहम योगदान के बावजूद देश को अंधेरे में रखा गया। दशकों तक इस समाज की संस्कृति और क्षमताओं की अनदेखी की गई।

इनके मुद्दों, स्वास्थ्य और शिक्षा को कोई महत्त्व नहीं दिया गया। आदिवासी समाज को उचित महत्व, प्राथमिकता न देकर पहले की सरकार ने राजनीतिक अपराध किया है।

चुनाव के नाम पर, अभावों के नाम पर वोट मांगे गए, दशकों तक सत्ता का सुख भोगते रहें लेकिन जनजाति समाज को असहाय छोड़ दिया गया।

2014 में मोदी सरकार के आने के बाद सभी समुदाय की तरह जनजातीय समाज के लोगों की भी उम्मीदें हिलोरें लेने लगी, इनके सपनों को भी पंख लगे।

उम्मीद के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास की सोच को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार का जनजातियों के विकास और उनकी विरासत और संस्कृति के संरक्षण पर प्राथमिकता के साथ ध्यान केंद्रित है।

सही मायनों में आदिवासी समाज को देश के विकास में उचित भागीदारी और हिस्सेदारी मोदी सरकार में मिल रही है।

चाहे गरीबों के घर हों, शौचालय हों, मुफ्त बिजली और गैस कनेक्शन हो मुफ्त ईलाज हो सड़क हो स्कूल हो जिस गति से ये सारी चीजें देश के विभिन्न हिस्सों में हो रही है

आदिवासी इलाकों में भी उसी प्रकार लाभ मिल रहा है। जनजातीय समाज के आत्मसम्मान की खातिर आज मोदी सरकार दिन रात काम कर रही है।

सर्व विदित है कि अटल बिहारी वाजपेई जी के नेतृत्व में जब पहली बार राजग की सरकार बनी तो इस समाज की आशाओं एवं आकांक्षाओं को समझने का गंभीर प्रयास हुआ।

अटल जी द्वारा जनजातीय समाज के उत्थान एवं इनके विकास एवं समृद्धि के लिए 1999 में अलग से एक मंत्रालय का गठन किया गया।

इसके अलावा 2003 में अटल जी की ही सरकार ने 89वें संविधान संशोधन के माध्यम से राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना कर इनके हितों को सुनिश्चित करने की पहल की।

अटल जी द्वारा जनजातीय समाज के उत्थान एवं सम्मान को लेकर प्रारंभ किया गया कार्य पिछले 8 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा और मजबूती से आगे बढ़ाया गया है।

अटल जी के कार्यकाल में इस समाज की बेहतरी के लिए बोया हुआ यह बीज आज वृक्ष बन चुका है।

पहली बार आज केन्द्र सरकार में जनजातीय समुदाय के तीन कैबिनेट मंत्री तथा पांच राज्य मंत्री के रूप में कुल 8 मंत्री हैं।

खुद प्रधानमंत्री ने देश की आजादी के लिए आदिवासियों के योगदान के संबंध में रिकॉर्ड मंगवाए और उनके स्मारक बनाए जा रहे हैं।

बड़ी जनजातीय आबादी वाले पूर्वोत्तर क्षेत्र की भी कांग्रेस ने लगातार उपेक्षा की, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने शासन में आते ही एक्ट ईस्ट नीति के तहत पूर्वोत्तर के विकास पर बल दिया।

पिछले 8 साल में पूर्वोत्तर राज्यों को देश के विकास की मुख्यधारा से जोड़ते हुए उन्हें राष्ट्रीय प्रगति का साझीदार बनाया गया।

जिस देश में जनजातीय समाज की अनदेखी इस प्रकार हुई हो कि 1947 में आजाद हुए देश को पहला आदिवासी कैबिनेट मंत्री 1994 में पी0 ए0 संगमा के रूप में मिला हो वहां आदिवासी समाज का कोई व्यक्ति देश के सर्वोच्च पद तक भी पहुंचेगा, इसकी किसी ने कभी शायद ही कल्पना भी की होगी ?

भाजपा हमेशा जनजातीय समाज की प्रगति के लिए कृतसंकल्प रही है और आज नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में जब राष्ट्रपति चुनने का अवसर आयाए तो भाजपानीत राजग के समर्थन से देश को द्रौपदी मुर्मू जी के रूप में पहला जनजातीय राष्ट्रपति मिला है।

द्रौपदी मुर्मू जी का राष्ट्रपति निर्वाचित होना भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐतिहासिक अवसर है।

देश की आजादी के बाद पहला अवसर है जब कोई आदिवासी समुदाय का व्यक्ति देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचा है।

देश के सबसे निचले पायदान पर मौजूद समाज से आने वाली द्रौपदी मुर्मू जी आज जब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंची हैं

तो निश्चित रूप से यह सिर्फ आदिवासी समाज ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए अत्यंत गौरव की बात है।

साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जनजाति सशक्तिकरण के संकल्प की एक उत्कृष्ठ उदाहरण भी है।

बीजेपी ने साबित किया है कि आदिवासी समाज की सबसे बड़ी हितैषी वही है और मोदी सरकार वंचित तबके के लिए काम करती है।

भगवान बिरसा का नाम किसी पहचान की मोहताज नहीं है। भारत के विभिन्न प्रान्तों में बसी लगभग 300 प्रमुख जनजातियाँ जब अपने सपूतों की गौरव गाथा का स्मरण करती हैं

तो एक स्वर्णिम नाम उभरता है बिरसा मुण्डा, जिसे केवल जनजाति समाज ही नहीं बल्कि पूरा देश आदर और असीम श्रद्धा के साथ नमन करता है।

जनजातीय समुदाय के लिए कितनी सुखद और गर्व की बात है कि जैसे पूरा देश हर साल गांधी जयंती, सरदार पटेल की जयंती मनाता है

अब वैसे ही भगवान बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवम्बर को अब हर साल जनजातीय गौरव दिवस के रूप में पूरे देश में मनाई जा रही है। यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है।

यह मोदी सरकार द्वारा जनजातीय समुदाय को दिया गया अनुपम उपहार है। देश भर में 200 करोड़ के बजट से जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों की स्थापना की जा रही है।

यह सब बातें दर्शाती हैं कि मोदी सरकार जनजातीय समाज के विकास और सम्मान के लिए मन, वचन और कर्म के साथ हर प्रकार से जुटी हुई है। कुछ समय पूर्व पद्म पुरस्कार दिए गए। जनजातीय समाज से आने वाले लोग जब राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो दुनिया हैरान रह गई। जनजाति समाज ने एक नहीं अनेक रत्न दिए हैं।

जनजातीय समाज की दिशा में कुछ उल्लेखनीय कार्य को देखा जाए तो केन्द्र की मोदी सरकार द्वारा संचालित जनजातीय उप.योजना बजट को 2021-22 में 21,000 करोड़ से 4 गुणा बढ़ाकर 86,000 करोड़ रुपए किया गया।

इसके अंतर्गत मोदी सरकार द्वारा जनजातीय समाज के लिए जल जीवन मिशन के तहत 1.28 करोड़ घरों में नल से जल पहुंचानेए 1.45 करोड़ शौचालय बनवाने, 82 लाख आयुष्मान कार्ड बनवाने एवं प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 38 लाख घर बनवाने जैसे अनेक कार्य किए गए।

एकलव्य मॉडल विद्यालयों का बजट 278 करोड़ से बढ़ाकर 1418 करोड़ रुपए और जनजातीय छात्रों के लिए निर्धारित छात्रवृत्तियों का बजट 978 करोड़ से बढ़ाकर 2546 करोड़ रुपए किया गया।

इसके अतिरिक्त उद्यमिता विकास के उद्देश्य से नई योजना में 327 करोड़ रुपए के बजट से 3110 वन धन विकास केंद्रों एवं 53,000 वन धन स्वयं सहायता समूहों की स्थापना की गई है।

मोदी जी ने डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड की स्थापना की और इस विसंगति को दूर करते हुए सुनिश्चित किया कि खनन से हुई आय का 30 प्रतिशत स्थानीय विकास में खर्च हो।

अब तक इस फंड के जरिए 57,000 करोड़ रुपए से भी अधिक की राशि एकत्रित हुई है, जिसका उपयोग जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए हो रहा है।

इसके अतिरिक्त जनजातीय उत्पादों के विपणन के लिए बने ट्राईफेड संचालित ट्राइब्स इंडिया आऊटलैट्स की संख्या 29 से बढ़ाकर 116 की गई है।

वहीं प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में जनजातीय समुदाय के आर्थिक विकास के लिए काफी काम किया जा रहा है।

आदिवासी समुदाय के युवाओं को केंद्र सरकार के कौशल विकास कार्यक्रम से जोड़ा गया है।

जनजातीय लोगों को आधुनिक तकनीकी से प्रशिक्षित कर कृषि, बागवानी, मछलीपालन, पशुपालन जैसे पारंपरिक पेशों के अलावा उन्हें फ्रिज.एसी, मोबाइल की मरम्मत ब्यूटीशियन, डाटा एंट्री ऑपरेटर, सुरक्षा गार्ड, घरेलू नर्स जैसे क्षेत्रों में पारंगत किया जा रहा है।

देश के तमाम राज्यों में रहने वाले लाखों आदिवासियों के मौलिक अधिकारों की रक्षा और जल, जंगल, जमीन पर उनके हक को बरकरार रखने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की सरकार लगातार काम कर रही है।

प्रधानमंत्री ने कहा है कि विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल जरूरी है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन आदिवासियों की कीमत पर नहीं होगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने साफ किया है कि जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों का अधिकार रहेगा क्योंकि वे उसकी उपासना करते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने जनजातियों के विकास को गति देने के लिए पिछले वर्ष जनजातीय बहुल इलाकों में 100 से ज्यादा विकास केंद्र खोलने की घोषणा भी की है जिस पर काम चल रहा है इन विकास केंद्रों में शिक्षाए अस्पताल जैसी आधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध रहेंगी।

उच्च शिक्षा और रिसर्च से जोड़ने के लिए भी अभूतपूर्व काम किया जा रहा है। पीएम मोदी ने अपनी सरकार के एक बड़े फैसले की तरफ ध्यान दिलाया कि जनजातीय समाज के बच्चों को पढ़ाई में एक बहुत बड़ी दिक्कत भाषा की आती थी लेकिन नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अब पढ़ाई स्थानीय भाषा में करने की सुविधा होगी। इसका लाभ निश्चित रूप से बच्चों को मिलेगा।

झारखंड के संदर्भ में देखा जाए तो अलग झारखंड का निर्माण अटल बिहारी वाजपेयी की दूरदर्शी सोच का ही नतीजा है।

झारखंड स्थापना दिवस और भगवान बिरसा की जयंती का दिन कोई संयोग नहीं है बल्कि वर्ष 2000 में जब केंद्र में एनडीए की सरकार बनी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने धरती आबा बिरसा मुंडा के जन्मदिन के मौके पर 15 नवंबर 2000 को दक्षिण बिहार के इस हिस्से के करोड़ों लोगों के इस पुराने सपने को हकीकत में बदल दिया।

संयुक्त बिहार में इस भूभाग के लोगों की शिकायत थी कि खनिज संपदा से संपन्न होने बावजूद भी वे समुचित विकास से पीछे हैं। आदिवासी अपने को वंचित और उपेक्षित महसूस कर रहे थे। भारतीय जनता पार्टी ने इस दर्द को महसूस किया।

भारतीय जनता पार्टी की यह भावना आदिवासियों के प्रति लगाव व समर्पण का प्रतीक है। बहरहाल जब झारखंड बना तब झारखंडवासियों की खुशियां और अनंत उम्मीदें स्वाभाविक थी। संयोग से इस राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनने का हमें ही अवसर प्राप्त हुआ।

मेरे नेतृत्व में जब राजग की सरकार थी तब कम समय में भी आदिवासी समाज के उत्थान को लेकर उल्लेखनीय कार्य हुए। चाहे स्कूली छात्राओं के बीच साईकिल वितरण हो स्थानीय युवकों की पारा शिक्षक के रूप में बहाली हो आदिवासी बेरोजगार युवकों को बस देकर रोजगार से जोड़ने की बात शिक्षा की बात हो हमने यथासंभव प्रयास किया।

उग्रवाद प्रभावित इलाकों में सड़क, शिक्षा,चिकित्सा, रोजगार आदि की दिशा में काफी कार्य हुए पंरतु समय अंतराल के साथ जो राजनीतिक कुहासा घिराए राजनीतिक अस्थिरता का जो दंश राज्य ने झेला वह किसी से छिपा नहीं है। राजनीतिक प्रयोगशाला के तौर पर प्रदेश का दोहन किया गया।

वर्ष 2014 में राज्य में बहुमत वाली भाजपा की स्थिर सरकार के बाद स्थितियां सुधरती दिखी परंतु आज हेमंत राज में झारखंड की स्थिति बद से बदतर हो चुकी है।

झारखंड की वर्तमान हेमंत सरकार में राज्य की आदिवासियों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है।

अबुआ राज का वादा करके सत्तासीन हुई हेमंत सरकार में सबसे अधिक दोहन आदिवासी समुदाय का ही हो रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जनजाति समाज को साथ में लेकर सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के मूल मंत्र के साथ देश तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है।

सुखद संकेत है कि भारत का सांस्कृतिक गौरव पुनः स्थापित हो रहा है।

 

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