स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव एवं  प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी

 

प्रो गोपाल पाठक
कुलपति
सरला बिरला विश्वविद्यालय रांची

RANCHI:  हमारा देश भारत 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र हुआ।

गुलामी की जकड़न से आजाद यहां के लोगों ने स्वतंत्र शब्द का अर्थ स्वच्छंद समझ लिया।

इस अनर्थ से अनुप्राणित जन यह भूल गए कि अभी अभी स्वतंत्र हुए इस देश को सही पटरी पर लाने के लिए कितने आत्मानुशासन की कर्मठता की आवश्यकता है।

कर्म और ज्ञान का देश भारत जिसके कण-कण में अध्यात्म रचा बसा है, उसके वासी स्वछंद आचरण में लीन हो अपने पिछड़ेपन का,

अपने कष्टों का दोष अपनी किस्मत और प्रशासन को देने लगे।

हालांकि ऐसी मानसिकता के बावजूद भी स्वतंत्र भारत में बहुत से कार्य हुए

प्रो नीलिमा पाठक
डीन, मानविकी एवं भाषा विज्ञान संकाय
सरला बिरला विश्वविद्यालय रांची

क्योंकि तत्कालीन उत्साही राष्ट्रप्रेमी नेता नि:स्वार्थ भाव से भारत के उत्थान- विकास में लग गए थे। पर कालांतर में स्थितियां बदलने लगी और त्याग, तपस्या, नि:स्वार्थ सेवा के स्थान पर स्वार्थ- भ्रष्टाचार ने अपनी पकड़ मजबूत की।

पद प्रतिष्ठा के प्रति बढ़ते मोह ने लोगों को ऐसी मोहांध बनाया कि हम अपने संविधान की,

उसकी प्रतिज्ञाओं और उसमें निहित आदर्शों की अवहेलना करने लग गए। 15 अगस्त 1947 को गुलामी का बंधन क्या हटा कि सारे बंधन टूटते ही गए।

मान मर्यादा का बंधन टूटा, नैतिकता – आदर्शों के बंधन टूटे।
15 अगस्त 2014 को लाल किले की प्राचीर से आशा की किरण की तरह एक आवाज आई

जिसने हमें स्वतंत्रता का न केवल बोध कराया बल्कि नैतिकता- आदर्शों का स्मरण भी कराया। उस आवाज ने बताया कि स्व+तंत्र का अर्थ है

अपना अनुशासन। प्रत्येक व्यक्ति को अनुशासित होना होगा, परिवार में बेटा बेटी को समान व्यवहार सिखाना होगा,

अपनी शारीरिक- मानसिक सुचिता- स्वच्छता पर ध्यान देना होगा एवं निरंतर अनुशासित होकर कर्म करते रहना होगा तब हमारा देश और हम सही मायने में स्वतंत्र होंगे।

यह आवाज से हमारे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री और विश्व के नंबर वन राजनेता नरेंद्र दामोदरदास मोदी की देश की जनता को लगा जैसे मन के दर्पण पर चढ़ी मोटी परत को किसी ने झाड़ कर साफ कर दिया है।

स्वयं को देश का चौकीदार कहने वाला आदरणीय मोदी जी ने स्वयं झाड़ू को उठाया और स्वच्छता अभियान में लग गए।

अपने आचरण, अपनी बोली से लोगों में उत्साह का बीज होते हुए उन्होंने हताश, निराश और गौरवहीन हो गए लोगों को जागृत किया।”उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत”.

जैसे स्वतंत्रता प्राप्ति के दीवाने गांधी का अनुकरण करने लगे थे वैसे ही हताश, निराश, कर्मच्युत देश की जनता मोदी का अनुसरण करने लगी।

जय जयकार करने लगी और गीता में कृष्ण का या कथन व्यवहारिक रूप से चरितार्थ होने लगा-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।

अर्थात जैसा श्रेष्ठ व्यक्ति आचरण करता है वैसा ही आचरण अन्य व्यक्ति भी करते हैं। वह श्रेष्ठ व्यक्ति अपने आचरण से जो प्रमाणित करता है

लोग भी वैसा ही आचरण करते हैं।
संसद में प्रवेश करते समय उसकी भूमि को प्रणाम कर लोगों को बताया कि कर्म स्थल तीर्थ स्थल की तरह श्रद्धास्पद होता है

और अपनी चार घंटे की नींद एवं बीस घंटे के अहर्निश कर्म से बताया कि कर्म ही ईश्वर है।

इनके इस व्यवहार को देखकर लोगों में विश्वास जगा कि कर्मठता से, कर्तव्यपरायणता से, सहयोग और निस्वार्थ सेवा से ही राष्ट्र का पुनर्निर्माण संभव है।

बढ़ती आबादी की समस्या का रोना रोने वाले इस देश के लोगों को उन्होंने बताया कि कैसे हम हमारी वृहद जनसंख्या को मानव संसाधन के रूप में विकसित कर सकते हैं।

इन्होंने कौशल विकास केंद्र के माध्यम से युवाओं को हुनर सीखने के लिए प्रोत्साहित करना प्रारंभ किया,

जिससे युवा विकास का इंजन बन सके। मेक इन इंडिया पर जोर देकर युवाओं को स्वदेशी आंदोलन की तरफ उन्मुख किया।

विकास गाथा के अभिनव प्रयत्न के क्रम में उन्होंने योजना आयोग के स्थान पर 2015 में नीति आयोग की स्थापना की।

जिसमें देश में उत्पादक ग्रोथ मूलक नव आर्थिक संरचना का सूत्रपात किया। हालांकि इसमें योजना आयोग के दायित्व समाहित किए गए पर इसे उससे कई गुना उत्तरदायी बनाया गया।

इस नीति आयोग ने सभी क्षेत्रों को अपने लक्षित परिणाम की प्राप्ति के लिए प्रतिबद्धता के साथ दूरगामी और तात्कालिक लक्ष्य को अभीष्ट बनाया। इसी का परिणाम है कि आज भारत विश्व आर्थिक व्यवस्था में चौथे पायदान पर है।

प्रधानमंत्री आवास योजना से कमजोर आर्थिक वर्ग के लिए पक्का घर उपलब्ध कराया तो उज्जवला योजना से धुएं वाले चूल्हे से प्रत्येक गांव- घर को मुक्ति मिली।

विधवा पेंशन, वृद्धा पेंशन, आयुष्मान भारत योजना ने लोगों में उत्साह- उमंग का संचार किया। सुकन्या समृद्धि योजना जो बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना का ही हिस्सा है,

बालिकाओं को भविष्य में आर्थिक रूप से सहायता पहुंचाने वाली एक बहुत महत्वाकांक्षी योजना को व्यवहार में उतारा। जिस कारण अब महिलाएं पुरुष की तरह सेना में अपनी सेवा दे रही हैं।

पुरुषों की तरह महिलाएं भी एनडीए की परीक्षा दे रही हैं। मोदी सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का ही परिणाम है कि

तीन तलाक की प्रथा समाप्त की गई और नारी खास कर मुस्लिम बहनों को मजबूत बनाने की दिशा में सार्थक कदम उठाया गया।

परिणामस्वरूप आज नारी परवश और पीड़ित नहीं है। घर- परिवार, समाज में नारी का दबदबा बढ़ा है।

मोदी जी ने विदेश नीति में मौजूद संकोंचो और संशयों को समाप्त किया तथा भारत की “सभ्यगत नम्र शक्ति” को कूटनीति का हिस्सा बनाया।

भारतीय विरासत योग और अध्यात्म जैसी “सॉफ्ट पावर” के माध्यम से इन्होने दुनिया के किसी भी छोर में रहने वाले भारतीयों से संवेदनशील संबंध बनाया।

इस कार्य द्वारा उन्होंने प्रत्येक भारतीयों के साथ-साथ विदेशियों को भी बताया कि भारत के अपने मूल्य हैं,

अपना अनुशासन है, अपना धर्म (नियम) है। अतः किसी अन्य के नीतियों का अनुसरण नहीं करेगा।

इनके इस अवबोध ने प्रत्येक भारतीयों को गौरवान्वित किया।

जब कोविड-19 अपने कहर से पूरे विश्व को आक्रांत कर रहा था तब मोदी जी की कार्यकुशलता और विदेशों से बनाए गए संबंध के कारण वैश्विक समुदाय ने भारत को चिकित्सा उपकरण, दवाएं, ऑक्सीजन, कंसंट्रेटर, वेंटिलेटर आदि भेजकर मदद की।

इन की प्रेरणा से देश के वैज्ञानिकों ने अपने कौशल से टीका निर्माण किया और विश्व में टीकों का सबसे बड़ा निर्यातक बनकर वैश्विक टीका आपूर्ति श्रृंखला में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

भारतीय मानवतावादी नीति के तहत भारत में लगभग 100 से अधिक देशों में टीका उपलब्ध कराया है। भारत का यह इतिहास रहा है कि किसी भी संकट में अंतरराष्ट्रीय मदद में वह भागीदार रहा है।

सच पूछिए तो मोदी जी एवं उनकी टीम के धैर्य, कुशल चिंतन और प्रयत्न ने कोविड काल में भारतीय विदेश नीति को एक नई दिशा प्रदान की। मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू किया गया

जिसका उद्देश्य है कि जिस पाश्चात्य सोच कि शिक्षा से हम अपने युवाओं को भारत के अतीत गौरव से, संस्कृति से विलग कर भौतिक प्रोन्नति के प्रलोभन में डालकर जो अनर्थ कर रहे हैं उस पर लगाम लगे।

पाश्चात्य सोच की शिक्षा का परिणाम है कि गुरु शिष्य का भाव समाप्त होता जा रहा है,

परिवार टूट रहे हैं, समाज में का कामांधता खूब फल-फूल रही है, आपसी रिश्ते तार-तार हो रहे हैं। कर्तव्यच्युत होते लोगों में अधिकार लिप्सा, पद लिप्सा, बढ़ती जा रही है।

मोदी जी ने अनुभव किया कि हम कितनी भी योजना क्यों न बना लें पर यदि शिक्षा सही नहीं दी जाएगी तो सब व्यर्थ है।

क्योंकि प्रत्येक प्रगति का मूलाधार शिक्षा ही है। इस नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मानवीय मूल्यों पर बहुत बल दिया गया है।

इस शिक्षा नीति का उद्देश्य है कि कोई भी छात्र संकीर्णता, हीनता आदि दैन्यभाव से अछूता रह कर स्वेछानुसार किसी भी क्षेत्र में, किसी भी विषय में शिक्षा प्राप्त कर सकता है,

जो छात्रों में आशावादी दृष्टिकोण विकसित करने में समर्थ है।

इस शिक्षा नीति में भारतीयता के साथ आधुनिकताओं के अनुरूप कौशल शिक्षा प्रदान की सिफारिश के साथ ऐसे पाठ्यक्रमों को अधिक प्रोत्साहित किया गया है

जिसके द्वारा युवा सीधे विद्यालय स्तर पर ऐसा प्रशिक्षण प्राप्त करें कि उन्हें रोजगार के लिए कही पलायन न करना पड़े।

ऐसा नहीं है कि श्री मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के पहले तक देश में कुछ कार्य नहीं हुए। बहुत कार्य हुए, पर यह कहने में संकोच नहीं कि हमारे नेताओं में कार्य करने की इच्छा शक्ति थी,

पर दृढ़ संकल्प का अभाव था। इच्छा शक्ति है उन्नति के लिए एक प्रकार की साधारण अभिलाषा जबकि दृढ़ संकल्प है अभिलाष आपूर्ति के साहस पूर्ण और सक्रिय प्रयत्न।

यह दृढ़ संकल्प श्री लाल बहादुर शास्त्री में था। पर उनका कार्यकाल उनके आकस्मिक निधन से बहुत हृस्व रहा।

फिर यह दृढ़ संकल्प दिखता है मोदी जी में, जिसका परिणाम है धारा 370 का हटना एवं 500 वर्ष पुराने विवादित राम मंदिर का शिलान्यास, तीन तलाक की समाप्ति इत्यादि।

श्री मोदी जी आज इसलिए प्रशंसित हैं और विश्व के नंबर वन नेता हैं

क्योंकि इन्होंने प्रशंसनीय पर साधारण और महत्वहीन दिखने वाले कार्यों को भी बुद्धियुक्त और उद्देश्यपूर्ण इच्छाशक्ति में परिणत कर सिद्ध कर दिया है।

जब राष्ट्र का नेतृत्व दृढ़ संकल्प से युक्त आचरणवान व्यक्ति के हाथ में हो तो वह अपने आचरण और कार्य की पारदर्शिता दोनों से ही राष्ट्र की प्रजा को अहर्निश बताता रहता है

कि जीवन में यदि उन्नति चाहते हो तो पहला कर्तव्य है-

सदा जागरूक रहना- “भूत्यै जागरणम” (यजुर्वेद 30.17)।
जागरूक व्यक्ति ही अपनी, अपने परिवार, संस्थान, समाज, राज्य और राष्ट्र की रक्षा करने में समर्थ हो सकता है।

“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और भूत्यै जागरणम” के द्वारा ही हम राष्ट्रहित में कर्म कर अमृत महोत्सव के भागीदार बनेंगे,

हकदार बनेंगे क्योंकि व्यक्ति कर्म से ही अमरत्व को प्राप्त करता है, शरीर से नहीं।
“तन्मे मन: शिव संकल्पमस्तु।”

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