शुरुआती दौर में पहचान नहीं होने से बुजुर्ग और युवा खो रहे हैं अपनी आंखों की रोशनीः रबीन्द्र नाथ महतो

झारखंड-बिहार के लगभग 150 नेत्र रोग विशेषज्ञ सम्मेलन में भाग लिया

शुरुआती दौर में बीमारी का पता लगने से बचायी जा सकती है आंखों की रोशनीः नेत्र रोग विशेषज्ञ

 

RANCHI:  : झारखण्ड ओफ्थलमोलॉजिकल सोसाइटी एवं रांची ओफ्थल्मिक फोरम के संयुक्त तत्वावधान में कन्वेंशन सेंटर, दरभंगा हाउस, रांची में एक दिवसीय झारखण्ड ओफ्थलमोलॉजिकल सोसाइटी के मिड टर्म कांफ्रेंस का आयोजन किया गया।

झारखण्ड विधानसभा अध्यक्ष . रबीन्द्र नाथ महतो और शिक्षा मंत्री . जगरनाथ महतो ने दीप प्रज्वलित कर कांफ्रेंस का विधिवत उद्घाटन किया।

इस अवसर पर लोकल आयोजन समिति के सचिव डॉ. राहुल प्रसाद, रिसेप्शन कमिटी के अध्यक्ष डॉ बी. पी. कश्यप, आर.ओ.एफ. की सचिव एवं झारखण्ड ओफ्थलमोलॉजिकल सोसाइटी की चेयरमैन साइंटिफिक कमिटी डॉ. भारती कश्यप, अध्यक्ष डॉ. एस. आर. सिंह, झारखण्ड ओफ्थलमोलॉजिकल सोसाइटी के सचिव डॉ. एस. के. मित्रा, अध्यक्ष डॉ. आनंद कुमार ठाकुर आदि गणमान्य डॉक्टर उपस्थित थे।

डब्लू. ओ. एस. कॉम्पिटिटिव रेजिडेंस सेशन के विजेताओं को 1. अनुपमा शर्मा, 2. ऐश्वर्या मोहंती, 3. अभिषेक सिन्हा को झारखण्ड विधानसभा अध्यक्ष श्री. रबीन्द्र नाथ महतो और शिक्षा मंत्री श्री. जगरनाथ महतो द्वारा शाल एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

इस कॉन्फ्रेंस में झारखंड-बिहार के लगभग 150 नेत्र रोग विशेषज्ञ इस सम्मेलन में भाग लिया, कांफ्रेंस का मुख्य उद्देश्य नेत्र रोगों की शुरुआती दौर में ही चिकित्सा हो जाय और इसके लिए जाँच के क्षेत्र में आई नई तकनीकों से सभी नेत्र चिकित्कों को रूबरू करना था।

केरेटोकोनस, ग्लूकोमा, एज रिलेटेड मैक्यूलर डिजनरेशन ,डायबिटिक रेटिनोपैथी आदि आँखों की कई बीमारियाँ हैं जिनका शुरुआती दौर में पता लगने से आँखों की रौशनी बचाई जा सकती है और इलाज में खर्च भी बहुत कम आता है।

इस कॉन्फ्रेंस में झारखंड के नेत्र चिकित्सकों ने अपनी अपनी स्पेशलिटी क्षेत्र में किए गए अपने सर्जरी का भी वीडियो प्रस्तुतीकरण किया।

चेयरमैन साइंटिफिक कमिटी डॉ. भारती कश्यप ने बताया की झारखंड में पहली बार महिला पोस्ट ग्रेजुएट छात्रों के लिए विशेष कॉम्पिटिटिव केस प्रेजेंटेशन सत्र का आयोजन किया गया, यह एक सराहनीय प्रयास है क्योंकि इस प्रकार के सत्र में भाग लेने से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने में उन्हें सहायता मिलेगी।

देश भर से आमंत्रित 8 विशिष्ट नेत्र चिकित्सक डॉ. राजेश सिन्हा, डॉ. अशोक ग्रोवर, डॉ. शतान्शु माथुर, डॉ. श्वेता वालिया, डॉ. सुदीप्ता घोष, डॉ. पूर्नाचंद्रा बी., डॉ. अर्नब दस और डॉ. नीता ने झारखंड के नेत्र रोग विशेषज्ञों के साथ नेत्र रोगों के शुरुआती दौर में पहचान हो इसकी जाँच के क्षेत्र में आई नई तकनीकों की विधियों पर विचार विमर्श किया।

इस कांफ्रेंस के मुख्य अतिथि झारखण्ड विधानसभा के अध्यक्ष श्री. रबीन्द्र नाथ महतो ने नेत्रों की विभिन्न बीमारियों की नई-नई डायग्नोस्टिक विधियों पर आधारित मिड-टर्म कांफ्रेंस के इस विषय वस्तु की काफी प्रशंसा की।

आज हमारे देश के कई युवा और बुजुर्ग कॉर्निया, रेटिना और ग्लूकोमा की बीमारियों कि शुरुआती दौर में पहचान नहीं होने की वजह से अपनी आँखों की रोशनी खो रहे हैं ऐसी स्थिति में डायग्नोसिस की नई-नई विधियों पर आधारित यह मिड-टर्म कॉन्फ्रेंस एक मील का पत्थर साबित होगी।

इस कांफ्रेंस के विशिष्ट अतिथि शिक्षा मंत्री श्री. जगरनाथ महतो ने बताया की बोकारो के एक स्कूल में जब वज्रपात हुआ तो बच्चों को बचाने के लिए डॉक्टरों ने बहुत मेहनत कर उनका जीवन बचाया, डॉक्टर धरती के भगवान है और मैं उनकी ही वजह से आज आप लोगों के समक्ष खड़ा हूँ इस लिए डॉक्टर है तो जीवन है।

इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी जाँच का महत्त्व :-

बैंगलोर के नेत्र चिकित्सक डॉ. पूरनचंद्रा बी. ने बताया कि आंखों की इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी जांच आँख के रेटीना एवं नस के फंक्शन को बताती है।

बाकी जो पुराने टेस्ट है उनसे आंखों के अंदर के पर्दे की फोटो हम लेते हैं लेकिन यह सब आँखों की फंक्शन को नहीं बताते हैं।

इस जांच से आपके पर्दे की किस सतह में बीमारी है इसका पता चल जाता है। अगर आँखों के पर्दे या नस की बीमारी है और आंखों के अंदर सब नॉर्मल दिख रहा है तो ऐसी स्तिथी में इस जाँच से बहुत मदद मिलती है।

सेंट्रल विजुअल फील्ड डिफेक्ट है या रोशनी से आँख बहुत चुंध्ययाती है रोशनी कम हो रही है और आँखों के अंदर सब नॉर्मल दिख रहा है ऐसी स्थिति में यह बहुत जानकारी देने वाली जांच है।

हार्ट की ईसीजी के समान इस जांच में किसी भी प्रकार के डाई का इस्तेमाल नहीं होता है।

जिन मरीजों को शरीर की अन्य बीमारी जैसे किडनी, हार्ट डिजीज, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, की बीमारी के चलते नस में डाई देना बहुत सुरक्षित नहीं होता वैसे मरीजों में यह जाँच काफी फायेदेमंद साबित होती है।

केरेटोकोनस की बीमारी में पेंटाकैम जांच का महत्व :-

एम्स, नई दिल्ली के नेत्र चिकित्सक डॉ. राजेश सिन्हा ने बताया की केरेटोकोनस बीमारी मे कॉर्निया पतला हो जाता है

और बाहर की तरफ कोन के आकार में उभर जाता है। जिससे आंखों से धुंधला दिखाई देने लगता है। केरेटोकोनस होने पर आंखे रोशनी और चमक के लिए बेहद सेंसटिव हो जाती है।

केरेटोकोनस 2,000 व्यक्तियों में से लगभग एक में होता है, यह 10 से 25 साल के उम्र के लोगों में पाया जाता है।

पेंटाकैम से जाँच करने पर शुरुआती स्टेज में ही केरेटोकोनस की पहचान बहुत आसानी से की जा सकती है और C3R मशीन से लेज़र उपचार कर इसे ठीक किया जा सकता है। अगर स्थिति बहुत ज्यादा खराब हो जाती है तो कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया जाता है।

ग्लोकोमा (काला मोतिया) के जाँच में OCT एवं फंडस फोटोग्राफी जांच का महत्व :-

कोलकाता की नेत्र चिकित्सक डॉ. सुदीप्ता घोष ने बताया की आगर यह रिस्क फैक्टर हैं तो ग्लूकोमा हो सकता है

• परिवार के किसी सदस्य को हुआ हो

• यदि शुगर के मरीज हैं तो

• माइनेस नंबर है

• 40 वर्ष के उम्र के पार हैं

• अंधेरे में देर से नजर आना

• रोशनी में अलग-अलग रंग दिखना

• अस्थ्मा व आथराइटिस रोग के मरीज लंबे समय तक स्टेरायल ले रहे हों

• कभी आंखों में चोट लगी हो

काला मोतियाबिंद के कारण अगर आँखों की रौशनी चली जाती है तो उसको दोबारा वापस नहीं लाया जा सकता। ऑप्टिकल कोहरेन्स टोमोग्राफी (OCT) और फंडस फोटोग्राफी के द्वारा आंखों की नस की जाँच कर शुरुआती दौर में ही इसकी पहचान बहुत आसानी से की जा सकती है।

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