जस्टिस ललित के विरुद्ध पेंशनरों का अविश्वास दहका

तीन सदस्यीय बेंच में ललित के शामिल रहना न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों सिद्धांतों के प्रतिकूल बताया

नागपुर : ईपीएस-95 मामलों की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए जस्टिस यू.यू. ललित की अनुशंसा पर तीन सदस्यीय बेंच का गठन किया गया है. बेंच में उन्हें भी शामिल किया जाना ईपीएस-95 पेंशनरों को अत्यंत नागवार गुजरा है. उनकी इस नाराजगी के पीछे उनकी वैध प्रतिक्रिया ने एक बार फिर देश की शीर्ष अदालत के लिए धर्मसंकट पैदा कर दी है.

उनकी इस नाराजगी की आवाज बने पेंशनर एक्टिविस्ट दादा तुकाराम झोड़े ने चीफ जस्टिस एन.वी. रमना से मांग की है कि इस बेंच से जस्टिस ललित को तत्काल हटाया जाए.

चीफ जस्टिस को भेजे गए एक पत्र में दादा झोड़े ने बेंच में जस्टिस ललित को शामिल किए जाने को न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों का उल्लंघन करार दिया है. उन्होंने माननीय जस्टिस ललित द्वारा अपने दो सदस्यीय बेंच के माध्यम से 29-01-2021, 25-02-2021 और 24-08-2021 को पारित आदेशों को अन्याय निरूपित किया है.

बिना किसी याचना के कर दिया खेल

अपने आरोपों की पुष्टि करते हुए दादा झोड़े ने बताया है कि जस्टिस ललित ने 29-01-2021 को ईपीएफओ की समीक्षा याचिकाओं पर पेंशनरों का पक्ष को सुने बिना, फिर 25-02-2021 को पहले तो सभी अवमानना आवेदनों और पेंशनरों के पक्ष में (सुप्रीम कोर्ट के साथ विभिन्न हाईकोर्ट द्वारा) पारित सभी आदेशों के संचालन पर बिना किसी मांग या प्रार्थना के रोक लगा दी. इसके बाद अंत में 24-08-2021 को स्वयं सुप्रीम कोर्ट के 2016 के निर्विवाद आरसी गुप्ता फैसले की शुद्धता पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हुए बिना किसी मांग अथवा बिना पक्ष को सुने ‘आरसी गुप्ता मामले’ में पारित आदेश के गुण-दोष की जांच के लिए 24-08-2021 को तीन सदस्यीय या इससे बड़ी पीठ के पास भेजने का आदेश जारी कर दिया.

आरसी गुप्ता केस के निर्णय को केंद्र सरकार ने भी 2017 को मान लिया था

दादा झोड़े ने जस्टिस रमना को बताया है कि आरसी गुप्ता केस के निर्णय को केंद्र सरकार ने भी 16-03-2017 को मान्यता दे थी. उसके बाद उसे लागू करने के लिए EPFO ने 23-03-2017 को एक सर्कुलर भी जारी कर दिया था. इसके तहत देश में लगभग 27,000 से अधिक पेंशनरों की पेंशन का पुनर्निर्धारण कर EPFO ने उसे स्वीकार भी कर लिया था. इतना ही नहीं, EPFO के मुख्य आयुक्त डॉ. वी.पी. जॉय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक अवमानना याचिका में एक हलफनामा दायर कर कहा है कि ‘हम आरसी गुप्ता जैसे सेवानिवृत्त पेंशनरों की पेंशन को पुनर्निर्धारित कर रहे हैं.’

सुलझे मामले को जानबूझ कर उलझाने की कोशिश

दादा झोड़े ने आरोप लगाया कि जस्टिस ललित ने सुलझे हुए मामले को जानबूझ कर उलझाने की कोशिश कर न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों का उल्लंघन किया है. उन्होंने बताया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 11 के अनुसार, “Res Judicata” के आधार पर, ईपीएफओ या भारत सरकार भी आरसी गुप्ता फैसले पर कोई आपत्ति सवाल नहीं उठा सकती है. ऐसे में माननीय सुप्रीम कोर्ट के जज को भी इसे नहीं छेड़ना चाहिए था. फिर भी ऐसा किया गया, जो बिलकुल ही गलत, अनुचित और अवैध है.

जस्टिस ललित के समक्ष केस को सूचीबद्ध करना अनुचित

झोड़े ने यह भी कहा कि चूंकि माननीय जस्टिस ललित ने इस केस को बड़ी बेंच को रेफर करने का आदेश पारित किया है, इन मामलों को उनकी अध्यक्षता वाली बड़ी बेंच या जिस बेंच में माननीय जस्टिस ललित मौजूद हैं, के समक्ष सूचीबद्ध करना उचित नहीं होगा. यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के साथ देश के करीब 70 लाख गरीब वृद्ध पेंशनरों के साथ घोर अन्याय होगा. यदि इसे सुनी जानी है तो इसे माननीय जस्टिस ललित के समक्ष नहीं लाने दी जानी चाहिए.

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