विवाहित युवा जोड़ों के बीच बढ़ता तनाव और तलाक चिंताजनक

तनाव और तलाक

कारण और निदान पर वरिष्ठ अधिवक्ता मृत्युंजय प्रसाद की प्रस्तुति

पड़ताल : एक युवती की शादी उसके माता-पिता ने एक करोबारी लड़के से करा दी। लड़की रांची के नामी कॉन्वेंट स्कूल से पढ़ी थी ,जबकि लड़का सामान्य स्कूल से पटना में पढ़ा लिखा था। विवाह के मात्र छह माह बाद ही लड़की के माता-पिता ने अपनी बेटी की दूसरी शादी का मन बना लिया। लड़की को ज्यादा विरोध न होने के बाद भी एक तलाक का होना वर्तमान समय में एक बड़ी समस्या को जन्म दे रहा है।

पूरे देश में इस प्रकार के एडजस्ट न कर पाने के कारण विवाह का टूटना जारी है। निश्चित ही एक अच्छे समाज विशेषकर भारतीय समाज जहां जन्म जन्मान्तर का संबंध मानकर निर्वाह किया जाता था वहीं यह एक सामाजिक समस्या बनकर खड़ा हो गया है। एक दूसरे मामले में बेंगलूरू के एक आईटी कंपनी में काम करने वाले रौशन को मां-बाप के दबाव में गांव की लड़की से शादी करनी पड़ी। दोनों में नहीं बनी लड़का ने लड़की को पत्नी मानने से इन्कार कर दिया। आए दिन विवाह टूटने की ऐसी कई वजहें पढ़ने को मिलती है। अदालतें ऐसे मुकदमों से भरी पड़ी हैं। कहीं वर पक्ष तो कहीं वधू पक्ष शोषण का झूठा मुकदमा दर्ज करा है।

हिंदू विवाह एक संस्कार है- हिंदुओं में विवाह को संस्कार माना गया है, जिसमें विवाह को जन्म-जन्म का रिश्ता कहा गया है। लेकिन लगता है यह सब अतीत की बातें है, क्योंकि अब विवाह में शोषण भी दिखता है, हत्याएं भी होती है और एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल भी चलता है। यहां हम विवाह के संबंध में विधि द्वारा स्थापित कानून की जानकारी दे रहे हैं ताकि वैवाहिक शोषण से निपटने में इसकी जानकारी लोगों के काम आ सके।

विवाह संबंधी अपराध की धारा 483 से 498

धारा-493 : स्त्री को इस विश्वास में रखकर सहवास कि वह पुरुष उससे विधिपूर्वक विवाहित है।
धारा-494 : पति-पत्नी में से किसी एक के द्वारा दूसरे के जीवित रहने के बावजूद दूसरा विवाह करना।
धारा-495 : एक पक्ष द्वारा अपने पूर्ववर्ती विवाह को छुपाकर दोबारा से विवाह करना।
धारा-496 : लड़का या लडकी द्वारा छल़पूर्ण विपरीत पक्ष को यह विश्वास दिलाना कि उनका विवाह विधिपूर्वक मान्य नहीं है।
धारा-497 : जारकर्म।
धारा- 498 : आपराधिक आराम से किसी पुरुष द्वारा विवाहित स्त्री को फुसलाना।
धारा-498क : किसी विवाहित स्त्री पर पति या पति के नातेदार द्वारा क्रूरतापूर्ण व्यवहार।

वैवाहिक मुकदमों की प्रकृति : कानूनन वैवाहिक स्थिति में स्त्री की सुरक्षा का विशेष ख्याल रखा गया है। वैवाहिक मुकदमों की प्रकृति देखें तो अक्सर वधु पर द्वारा वर पक्ष पर दहेज प्रताड़ना, शारीरिक शोषण और पुरुष पर स्त्री से संबंध जैसे मामले दर्ज कराए जाते हैं, वहीं वर पक्ष द्वारा स्त्री का किसी गैर मर्द से अवैध संबंध, मानसिक प्रताड़ना जैसे मामला दर्ज कराने के मामले देखे गए हैं। वैसे कई बार अदालत में यह भी साबित हुआ है कि वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को तंग करने के लिए अक्सर दहेज के मामले दर्ज कराए जाते हैं। तिहाड़ के महिला जेल में छोटे से बच्चे से लेकर 90 वर्ष की वृद्वा तक दहेज प्रताडना के आरोप में बंद हैं।

दहेज है स्त्रीधन : दहेज का अभिप्राय विवाह के समय वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को दी गई चल-अचल संपत्ति से है । दहेज को स्त्रीधन कहा गया है। विवाह के समय सगे-संबंधियों, नातेदारों आदि द्वारा दिया जाने वाला धन, संपत्ति और उपहार भी दहेज के अंतर्गत आता है। यदि विवाह के बाद पति या पति के परिवार वालों द्वारा दहेज की मांग को लेकर दूसरे पक्ष को किसी किस्म का कष्ट,संताप या प्रताड़ना दे तो स्त्री को यह अधिकार है कि वह उक्त सारी संपत्ति को पति पक्ष से वापस ले ले।

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27 : स्त्री को इस प्रकार की सुरक्षा प्रदान करती है। वर्ष 1985 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फाजिल अली ने अपने एक फैसले में निर्णय दिया था कि स्त्री धन एक स्त्री की अनन्य संपत्ति है। यह संपत्ति पति पक्ष पर पत्नी की धरोहर है और उस पर उसका पूरा अधिकार है। इसका उलंघन दफा-406 के तहत अमानत में ख्यानत का अपराध है, जिसके लिए जुर्माना और सजा दोनों का प्रावधान है। इस निर्णय की वजह से धारा-27 की समुचित व्याख्या हो गई है।

कानूनन स्त्री की सुरक्षा : क्रिमिनल(criminal) अमेंडमेंट की धारा 498 क के अनुसार, एकविवाहित स्त्री पर उसके पति या उसके रिश्तेदार द्वारा किया गया अत्याचार या क्रूरता का व्यवहार एक दंडनीय अपराध है। विधि में यह प्रावधान भी है कि विवाह के सात वर्ष के भीतर यदि पत्नी आत्महत्या कर लेती है या उसकी मौत किसी संदिग्ध परिस्थिति में हो जाती है तो कानून के दृष्टिकोण से यह धारणा बलवती होती है कि उसने यह कदम किसी किस्म की क्रूरता के वशीभूत होकर उठाया है।

पत्नी द्वारा किया जाने वाला अत्याचार : अदालत में स्त्री को मिली कानूनी सुरक्षा का माखौल उड़ते भी देखा गया है। अपने पूर्व के प्रेम संबंध, जबरदस्ती विवाह, आपस में सामंजस्य नहीं बैठने या किसी अन्य कारणों से स्त्री इन सात वर्षों में आत्महत्या की धमकी देते हुए पति का मानसिक शोषण करने की दोषी भी पायी गयी हैं। जबरदस्ती दहेज प्रताड़ना में पूरे परिवार को फंसाने का मामला आए दिन सामने आता रहता है। विवाह होते ही कम से कम दोनों सात साल तक अपने-अपने परिवार से अलग आशियाना बसाए। यह भी देखा गया है कि पारिवारिक हस्तक्षेप के कारण ही एक लड़का-लड़की का जीवन नरक बन जाता है।ऐसी स्थिति में उन्हें स्वतंत्र रुप से जिन्दगी जीने दें तो दोनों का जीवन बेहतर हो पायेगा।

मृत्युंजय प्रसाद
मृत्युंजय प्रसाद

(लेखक मृत्युंजय प्रसाद सिविल कोर्ट रांची के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं)

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