यूक्रेन पर रूस-अमेरिका तनाव, किसका पक्ष लेगा भारत

रूस और नैटो के बीच बढ़ते तनाव

रूस और नेटो के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत के लिए किसी का पक्ष लेना मुश्किल हो गया है. लिहाजा वह संतुलन बनाने की कोशिश में लगा है. अमेरिका और रूस दोनों भारत के रणनीतिक साझीदार हैं. लेकिन क्या यूक्रेन पर रूस और अमेरिका की अगुआई वाले नेटो के बीच चरम पर पहुंच चुके तनाव को देखते हुए वह राजनयिक बैलेंस बनाने में कामयाब होगा.

 

दरअसल इस मामले में अमेरिका भारत को अपने पाले में देखना चाहेगा. लेकिन भारत रणनीतिक तौर पर रूस का भी करीबी है. वह लंबे वक्त से रूसी रक्षा उपकरणों और हथियारों का खरीदार रहा है. इसलिए रूस पर उसकी निर्भरता बनी हुई है. इसके साथ ही उसे चीन के आक्रामक रुख का भी सामना करना पड़ता है. इस लिहाज से भी रूस का साथ जरूरी l

अमेरिका और रूस के बीच मनमुटाव

अमेरिका और रूस के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश में ही उसने 31 जनवरी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यूक्रेन तनाव पर चर्चा के लिए होने वाली वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया. लेकिन जब चर्चा हुई तब वहां मौजूद भारत के प्रतिनिधि ने इस तनाव को कम करने और क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता की अपील की.

भारत के लिए पसोपेश की स्थिति

यूक्रेन पर रूस और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने से भारत को लिए पसोपेश की स्थिति है. भारत ऐसी स्थिति नहीं चाहेगा, जिसमें उसके दोनों सहयोगी आपस में टकरा जाएं. अगर ऐसा हुआ तो भारत को किसी एक पाले में आना होगा और यह उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को बड़ा झटका दे सकता है. बदलते भू-राजनीतिक समीकरण में भारत के लिए यह मुश्किल घड़ी होगी.
कूटनीतिक मामलों के जानकार इस मामले में मीडिया में खुल कर अपनी राय रख रहे हैं. भारतीय सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल हर्ष कक्कड़ ने 1 फरवरी को भारतीय अंग्रेजी अखबार स्टेट्समैन में लिखा ”भारत के लिए निष्पक्ष रहना सबसे बढ़िया विकल्प है. इसमें कोई शक नहीं है कि भारत की निष्पक्षता ने अमेरिका को चिढ़ा दिया है. अगर भारत ऑकस (AUKUS) का सदस्य होता तो उसे अमेरिका का समर्थन करना ही पड़ता है. ऑकस में ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका शामिल हैं l